Wednesday, September 12, 2018

बाबा तुलसीगिरी जी महाराज



बाबा तुलसीगिरी जी महाराज


ऐसे ही एक सच्चे साधू की कहानी आपको बताने जा रहा हूँ ..........जिनको लोग पागल बाबा के नाम से जानते है ! पर मेरे लिए ये पागल नही बल्कि ठीक वैसे ही है जेसा कई भगवान की कहानियों में पड़ते है की जब किसी आदमी को परमेश्वर के दर्शन होते है तो वो आदमी अपनी सुद्बुध खो देता है ! और उसको इस नश्वर शरीर व् दुनियादरी की मोहमाया से विरक्ति हो जाती है ! वो इन्सान अपना अगला - पिछला सब कुछ भूल जाता है, और वो पागलो जेसी हरकतें करने लगता है ! ऐसा ही कुछ इन बाबा की कहानी में भी है !

बाज़ार से चारो ओर दस किलोमीटर के दायरे में ऐसा कोई न होगा जो बाबा जी को जानता न हो या जिन्होंने घूमते हुए न देखा हो ! चाहे वो कोई किसी भी सरकारी कार्यालय का बड़ा अधिकारी हो या कोई छोटा सा कर्मचारी , और न बाज़ार का ऐसा कोई दुकानदार होगा , न कोई शहर का बुद्धिजीवी साहित्यकार होगा , न कोई समाजसेवी राजनेता होगा और न कोई लोगो को सच का आइना दिखता पत्रकार जिसने कभी बाबा जी को न देखा हो !

लगभग आज से तीस-बतीस साल पहले जब में स्कूल में पड़ता था तब से लेकर आज तक इनको इसी तरह घूमते हुए पीठ में दस पन्द्रह किलो का बोझा लेकर देख रहा हूँ जैसे उस वक्त थे वेसे ही आज भी दिखते है! मुझे नही लगता जब से साधू बने है तब से लेकर आज तक कभी किसी के घर इन्होंने शाम गुजारी हो या कभी किसी ने इनको अपने घर बुलाने की जहमत उठाई हो  पुरे इलाके में किसी भी घर पर चाहे कोई भी शुभ से शुभ कार्यक्रम ही क्यों न रहा हो जिसमे हम दुनिया भर के लोगो बुलाते है जिसमे रिश्तेदारों - मित्रो के साथ-साथ कई  साधू - संत समाज के लोग भी बुलाते है कई संतो को तो उनके आश्रम से लेकर गाँव या शहर तक लाने में ही लाखो खर्च कर देंगे पर इनको कौन बुलाएँ ! ये संत पागल जो ठहरे और पागल को कौन अपने घर बुलता है ! कभी किसी ने ये सोचा भी न होगा जहाँ हम लोग कई बार बहुत बड़े-बड़े वेद- पाठ या कई दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान, व्रत, तप और यज्ञ ये सोच के करवाते है के हमारे घर की ही नही बल्कि पुरे इलाके की सुख समृधि बनी रहे जिसमे हम हजारो की संख्या में भीड़ जमा करते है वही पर पर एक संत पागलो की तरह कई सालो से जंगल से गाँव , गाँव से शहर और शहर से शाम होते ही जंगल की और भटकता हुआ दिखाई देता है जो हर रोज जंगल में किसी गुफानुमी जगह में रहता है! जिसको न गर्मी का डर और न भीषण सर्दी की प्रवाह ! जिसके पास न घर, न कुटिया , जिसको न किसी जंगली पशु का भय न किसी भुत-प्रेत का खोप ....इतने वर्षो से जो ऐसा कठोर जीवन यापन रहा है वो सच्चा साधु , सच्चा भक्त ही हो सकता है कोई आम इन्सान नहीं  

            कभी कभार कुछ खाने-पीने की जरूरत का सामान लेने शहर की तरफ आते है ............ कभी मजाल है किसी राह चलते से कुछ मांग ले राह चलते उसी से मांगेगे जिनको ये जानते हो ..........ये मांगते वही पर है जहाँ इनको पता है यहाँ से मुझे कभी खाली हाथ नही लोटाया है ! गाँवो में कई दुकानदार ऐसे है जो कभी बाबा जी को पागल समझ के कभी दुत्कारते नही है बल्कि सामने से बहुत ही प्यार से पूछते है बाबा जी और बताओ क्या चाहिए ! जहाँ कहीं भी मांगते है बस दो मिनट ही रुकते है दिया किसी ने तो ठीक, अगर नही दिया तो आगे बड़ जाते है ! शहर में चाहे पांच सो दुकाने होगी पर मांगेगे केवल एक -दो दुकान में ही .... आजकल बहुत से ढोंगी मिलते है जो दिन भर पूरे शहर में लोगो को धर्म के नाम पर ठगेंगे और शाम को दारू की दुकान में मिलेंगे ! गाँव की तरफ इनको बहुत कम जाते देखा जाता है ! किसी ने मुझे बताया जिस घर में छोटे बच्चे इनकी भेषभूषा देख कर डर जाये तो ये वहां भी दोबारा मुड़ कर नही जाते है! भेषभूषा से भले ही बाबा पागल दिखाई दे पर हमने कभी नहीं सुना इनकी वजह से कभी किसी को कोई परेशानी हुई हो ! 

आप सभी लोगो व् सभी पार्टियों के स्थानीय राजनेताओ से विनम्र निवेदन है - : आप लोग  कभी छोटी -२ बातों के लिए बड़े -२ आन्दोलन लोगो के  अधिकारों के लिए करते हो वहीं कोई भी  व्यक्ति असह्य अवस्था  घूम रहा हो  तो  उसकी और  भी ध्यान देना भी जरूरी है, नहीं तो उपरवाला  कभी माफ़ नहीं करेगा !.....अपने घर का ध्यान व्  पालन पोषण तो पशु पक्षी  भी  करते  है  फिर उन में और हम में  अंतर क्या ...........?


कभी किसी ने ये सोचा होगा अगर हमारे घर परिवार का कोई सदस्य ऐसा भटक जाये तो हमारे दिल पर क्या गुजरेगी ........ हम लोग कही न कही आज के युग में पाश्चत्य संस्कृति की और जा रहे है जहाँ पर हमे अपने घर - परिवार के सिवा कुछ भी नजर नही आता है ! भारतीय संस्कृति और भारतीय परम्परा तो वसुधैव कुटुम्बकम जैसी नीतियों पर चलने का रास्ता दिखता है ! पर न जाने हम इतने निष्ठुर या इतने ज्यादा बुदिजिवी केसे हो जाते है जिसमे हमे किसी का दुःख तकलीफ दिखाई ही नहीं देता!  अगर कोई आज तक का इनका सच्चा साथी है तो केवल इनका शरीर जो समय के साथ साथ बुडापे की और जा रहा है ये भी न जाने कब धोखा दे जाएं ! ........

वर्तमान में नकली और ढोंगी साधुओं ने वातावरण को इतना प्रदूषित कर रखा है कि लोग सच्चे साधुओं पर भी शंका करते हैं। इसका कारण यह है कि यह पहचानना बहुत मुश्किल हो गया है कि कौन सच्चा साधु है और कौन ढोंगी साधु है।
सच्चा साधु तीन बातों से हमेशा दूर रहता है- नमस्कार, चमत्कार और दमस्कार। इनके अर्थ जरा विस्तार से बताना आवश्यक है। ‘नमस्कार’ से दूर रहने का अर्थ है कि सच्चा साधु केवल अपने से बड़े साधु को प्रणाम करता है, किसी गृहस्थी को कभी नहीं, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली या शक्तिशाली क्यों न हो। जो साधु किसी ताकतवर गृहस्थी को स्वयं पहल करके प्रणाम करता है, वह चापलूस हो सकता है, साधु नहीं। ‘चमत्कार’ से दूर रहने का अर्थ है कि सच्चा साधु कोई चमत्कार नहीं दिखाता। चमत्कार दिखाकर लोगों को भ्रमित करने वाले व्यक्ति जादूगर या बाजीगर हो सकते हैं, साधु नहीं। सच्चा साधु तो हर जगह केवल परम प्रभु की कृपा का ही चमत्कार देखता है। कभी उसका श्रेय स्वयं नहीं लेता। ‘दमस्कार’ के दूर रहने का अर्थ है कि सच्चा साधु कभी अपने लिए धन एकत्र नहीं करता और न किसी से धन की याचना करता है। वह केवल अपनी आवश्यकता की न्यूनतम वस्तुएं माँग सकता है, कोई संग्रह नहीं करता। धन माँगने और संग्रह करने वाला व्यक्ति निश्चय ही ढोंगी होता है, सच्चा साधु नहीं। अपने रहने के लिए भी वह केवल एक छोटा सा आश्रम या कमरा या झोंपड़ी बना सकता है और साधारण तरीके से रह सकता है। आडम्बरपूर्ण 5 स्टार आश्रम बनाने वाले और चाहे कुछ भी हों, पर सच्चे साधु तो बिल्कुल नहीं हो सकते। यदि हम अपने सम्पर्क में आने वाले साधुओं पर इन तीन कसौटियों को लागू करें, तो सरलता से पहचान सकते हैं कि कौन सा साधु सच्चा है और कौन सा झूठा। ये
‘नमस्कार’ से दूर रहने का अर्थ है कि सच्चा साधु केवल अपने से बड़े साधु को प्रणाम करता है, किसी गृहस्थी को कभी नहीं, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली या शक्तिशाली क्यों न हो। जो साधु किसी ताकतवर गृहस्थी को स्वयं पहल करके प्रणाम करता है, वह चापलूस हो सकता है, साधु नहीं। ‘
चमत्कार’ से दूर रहने का अर्थ है कि सच्चा साधु कोई चमत्कार नहीं दिखाता। चमत्कार दिखाकर लोगों को भ्रमित करने वाले व्यक्ति जादूगर या बाजीगर हो सकते हैं, साधु नहीं। सच्चा साधु तो हर जगह केवल परम प्रभु की कृपा का ही चमत्कार देखता है। कभी उसका श्रेय स्वयं नहीं लेता।
‘दमस्कार’ के दूर रहने का अर्थ है कि सच्चा साधु कभी अपने लिए धन एकत्र नहीं करता और न किसी से धन की याचना करता है। वह केवल अपनी आवश्यकता की न्यूनतम वस्तुएं माँग सकता है, कोई संग्रह नहीं करता। धन माँगने और संग्रह करने वाला व्यक्ति निश्चय ही ढोंगी होता है, सच्चा साधु नहीं। अपने रहने के लिए भी वह केवल एक छोटा सा आश्रम या कमरा या झोंपड़ी बना सकता है और साधारण तरीके से रह सकता है। आडम्बरपूर्ण 5 स्टार आश्रम बनाने वाले और चाहे कुछ भी हों, पर सच्चे साधु तो बिल्कुल नहीं हो सकते। यदि हम अपने सम्पर्क में आने वाले साधुओं पर इन तीन कसौटियों को लागू करें, तो सरलता से पहचान सकते हैं कि कौन सा साधु सच्चा है और कौन सा झूठा। ये
यदि हम अपने सम्पर्क में आने वाले साधुओं पर इन तीन कसौटियों को लागू करें, तो सरलता से पहचान सकते हैं कि कौन सा साधु सच्चा है और कौन सा झूठा। ये
‘नमस्कार’ से दूर रहने का अर्थ है कि सच्चा साधु केवल अपने से बड़े साधु को प्रणाम करता है, किसी गृहस्थी को कभी नहीं, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली या शक्तिशाली क्यों न हो। जो साधु किसी ताकतवर गृहस्थी को स्वयं पहल करके प्रणाम करता है, वह चापलूस हो सकता है, साधु नहीं। ‘

चमत्कार’ से दूर रहने का अर्थ है कि सच्चा साधु कोई चमत्कार नहीं दिखाता। चमत्कार दिखाकर लोगों को भ्रमित करने वाले व्यक्ति जादूगर या बाजीगर हो सकते हैं, साधु नहीं। सच्चा साधु तो हर जगह केवल परम प्रभु की कृपा का ही चमत्कार देखता है। कभी उसका श्रेय स्वयं नहीं लेता।

‘दमस्कार’ के दूर रहने का अर्थ है कि सच्चा साधु कभी अपने लिए धन एकत्र नहीं करता और न किसी से धन की याचना करता है। वह केवल अपनी आवश्यकता की न्यूनतम वस्तुएं माँग सकता है, कोई संग्रह नहीं करता। धन माँगने और संग्रह करने वाला व्यक्ति निश्चय ही ढोंगी होता है, सच्चा साधु नहीं। अपने रहने के लिए भी वह केवल एक छोटा सा आश्रम या कमरा या झोंपड़ी बना सकता है और साधारण तरीके से रह सकता है। आडम्बरपूर्ण 5 स्टार आश्रम बनाने वाले और चाहे कुछ भी हों, पर सच्चे साधु तो बिल्कुल नहीं हो सकते। यदि हम अपने सम्पर्क में आने वाले साधुओं पर इन तीन कसौटियों को लागू करें, तो सरलता से पहचान सकते हैं कि कौन सा साधु सच्चा है और कौन सा झूठा। ये
यदि हम अपने सम्पर्क में आने वाले साधुओं पर इन तीन कसौटियों को लागू करें, तो सरलता से पहचान सकते हैं कि कौन सा साधु सच्चा है और कौन सा झूठा। ये
यदि हम अपने सम्पर्क में आने वाले साधुओं पर इन तीन कसौटियों को लागू करें, तो सरलता से पहचान सकते हैं कि कौन सा साधु सच्चा है और कौन सा झूठा। ये सभी कसौटियां जो हिन्दू धर्म में साधू के लिए बनी है उसमे हमारे ये साधु श्री तुलसा गिरी जी महाराज सबसे खरे उतरते है जिसके लिए हम इनका दिल से नमन !! अभिनन्दन !! करते है !






गांव का वो सच्चा साधु
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जिसके पेरौ मे जूता नही
सिर पर छाता नही
बेंक मे खाता नही
परिवार से नाता नही
उसे कहते है साधु ।

जिसके तन पे कपडा नही
वचन मे लफड़ा नही
मन मे क्षगडा नही
उसे कहते है साधु ।

जिसका कोई घर नही
किसी बात का डर नही
दुनिया का असर नही
उसे कहते है साधु ।

जिसके पास बीबी नही
साथ टीवी नही
अमीरी गरीबी नही
बिसतर पर सोता नही
होटेल मे खाता नही
उसे कहते है साधु ।


 धन्य है वो आसपास के भले ग्रामीण, वो दुकानदार जो इनकी सहायता करते थे और जिन लोगो की वजह से इनको  नया  जीवन, नया रूप मिला ! आज कई वर्षो के बाद बाबा जी का नया रूप देखने के बाद मन को जहाँ बहुत ही आनंद और सकुन मिला वहीँ बाबा जी का लगभग पचास वर्षो से ज्यादा का वनवास का जीवन जीने से मुक्ति ! संकट और दुःख का समय तो भगवान् श्री राम के जीवन में भी आया था ! सुना है कभी कभी उपरवाला भी अपने सच्चे भक्त की परीक्षा लेता है ! पर प्रार्थना करते है ऐसी कठिन परीक्षा फिर कभी किसी की न हो ! बजुर्ग चाहे कोई भी हो और जो उनका सम्मान और प्रेम करता है उपरवाले का आशीर्वाद उसी के साथ अनंत काल तक बना रहता है


 !! हर हर महादेव !! जय श्रीराम !! वंदेमातरम !!

                  Rgds.... Blood Donor Naresh Sharma (Majholi) Theog, Shimla (HP)


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बाबा तुलसीगिरी जी महाराज

बाबा तुलसीगिरी जी महाराज ऐसे ही एक सच्चे साधू की कहानी आपको बताने जा रहा हूँ .......... जिनको लोग पागल बाबा के नाम से जानते है ! ...